उलटा-पुलटा कविता text book

 


उलटा-पुलटा 


चलते-चलते निचली छत से

 गिरती जब छिपकली छपाक, 

तुरत संभल जाती उस क्षण ही 

उठ चल देती अपने आप। 


ऊपर की डाली से बंदर 

जब आ गिरता है नीचे, 

झटपट पकड़ दूसरी डाली 

हँसता है आँखें मीचे। 


तिलचट्टे, चींटे जब चलते

 एकाएक पलट जाते हैं.

 झटक हाथ-पैरों को अपने

 फिर सीधे हो चल पात है। 


चीटी गिरती, मकड़े गिरते 

गिरगिट गिरते और सँभलते.

 गिरने पर वे साहस खोकर 

कभी न अपनी आँख मलते। 


गिरने और पिछड़ने पर 

जो हिम्मत खाते, पछताते हैं। 

धूल झाड़ जो तुरंत सँभलते 

वे जीवन में सुख पाते हैं। 


- भगवती प्रसाद द्विवेदी 


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