प्रिय सुप्पंदी,
सप्रेम नमस्कार।
मैं तुम्हें यह संदेश इसलिए लिख रहा हूँ ताकि तुम्हें समझा सकूँ कि दादी माँ की चप्पलों को बड़ा करने की तुम्हारी "तरकीब" क्यों गलत साबित हुई।
तुमने रास्ते में मजदूरों से यह तो सही सीखा था कि गरम होने पर लोहे की पटरियाँ फैलकर लंबी हो जाती हैं, और इसीलिए उनके बीच जगह छोड़ी जाती है। लेकिन सुप्पंदी, तुम्हारा यह अंदाजा गलत था कि यह नियम हर चीज़ पर एक जैसा लागू होता है।
तुम्हारी गलती के मुख्य कारण थे कि
- तुमने चप्पलों को सीधे तवे पर तपाया, जिससे वे गर्मी बर्दाश्त नहीं कर पाईं और फैलने के बजाय पूरी तरह से पिघलकर गायब हो गईं।
- दादी माँ ने तुम्हें कहा थी कि चप्पलों को बदलवाकर दूसरी जोड़ी" ले आओ। तुमने उनकी बात न मानकर अपनी तरकीब लगाई जिससे चप्पलों का "सत्यानास" हो गया।
अगली बार, कोई भी वैज्ञानिक नियम लागू करने से पहले यह जरूर सोचना कि वह चीज़ किस पदार्थ की बनी है। आशा है कि तुम अपनी इस गलती से सीखोगे!
तुम्हारा शुभचिंतक
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